गुरुवार, 15 अक्टूबर 2015

जी लें जीभर कर।


जी ले
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जी लें,
जीभर कर
हर पल को,
न रहे
कोई गिला-शिकवा,
फिर कल को।
पल पल का अपना स्वाद है,
कोई क्षण नहीं अपवाद है।
दु:ख हो,सुख हो
हो विरह-मिलन।
कंटक-कीच हो,
या हो अगन।
हो मदमाती मधुमय बसंत,
वा गृष्मातप से झुलसा दिगन्त।
प्रति-पल
प्रेममय हो घनीभूत;
जीवन-रस
लें निचोड़ प्रभूत।
******जी लें,
जीभरकर हरपल;
रहें न रहें
हम-तुम
फिर कल।