मंगलवार, 28 मई 2019

फ़ासला भी ज़रूरी है
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होती कभी तो मज़बूरी है
अनचाही हो जाती दूरी है।
और कभी लगता है ऐसा
यह फ़ासला भी ज़रूरी है।।

भाग रहा जीवन पल-छिन
रह जाती समझ अधूरी है।
पास पास रहकर हरदम हीं
महत्त्व  न दिखता पूरी है।।
हममें ये फ़ासला ज़रूरी है।।

शनिवार, 25 मई 2019

चेहरे के पीछे चेहरा है
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दिखता वो जो है नहीं
तन कहीं और मन कहीं
भीतर भभकता गंद बड़ी
कुत्सित कुंठा गहरा है
चेहरे के पीछे चेहरा है।।

लगता ऐसा सुनता सबका
करता है बस अपने मन का
कानों पर तो जूं न रेंगे
सच में वो तो बहरा है
चेहरे के पीछे चेहरा है।।

लूटमार कर महल खड़ा
ऐशगाह है भरा पड़ा
असलियत ना दिख जाए
पहरों पै लगा पहरा है
चेहरे के पीछे चेहरा है।।
  _अशोक झा'दुलार'
काम करो और बातें कम
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बातों से बात नहीं बनती
काम किए जा छोड़ शरम।
गाँठ बाँध लो मंत्र सरीखा
काम से जाता दुर्दिन थम।
काम करो और बातें कम।।

हैं जो कर्मठ बातों में उनकी
ठसक अलग और होता दम।
कैसी भी हो हालात मगर
घेर ना पाता उनको ग़म।
काम करो और बातें कम।।

कर्महीन हीं भाग्य भरोसे
बैठे रहते हैं हरदम।
कर्म बिना फल की चाहत
पाला करता है वो भरम।
काम करो और बातें कम।।

लगे काम में,दु:ख बिसराता
कुदरत का भी यहीं नियम।
काम से काम रखे हर कोई
इससे बढ़कर कौन धरम।
काम करो और बातें कम।।
   __अशोक झा'दुलार'

बुधवार, 22 मई 2019

सुहानी-सी यादें
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इक झोंका आया,ताजी ताजी हवा की
दूर-दिल्ली से भी दूर-देश से।
अपना वो जो आया
परदेशी नहीं पर परदेश से।
लंबे बाल,अंदाज सूफियाना
वेश दरवेश से।

वो आया,ज़ुल्फें लहराया
करता डुगडुग डुगडुगी बजाया।
कि खिल गए चतुर्दिक पुष्प-गुच्छ
सारी बगिया महमहा उठी।
चीं चीं करतीं जैसे चिड़िया
समवेत स्वरों से चहचहा उठी।
गाने लगी कोयल, बुलबुल लगी नाचने।
और गोरैया-मैना-कबूतर
सबके सब आए उतर
मेरे मुँडेर पर,लगी कथा बाँचने।

रंग-रंगीली तितली रानी
पंख फड़फड़ाने लगी।
आओ रे आओ,नाचो गाओ,धूम मचाओ
चीजें सहेजी, हड़बड़ाने लगी;
कि दादी-अम्मा बड़बड़ाने लगी।
छप छप छपाक-छप
ढन-ढन-ढनाक-ढन।
लुढ़का लोटा,बोल उठी थाली
टन-टन-टनाक-टन।
झाल-मृदंगम बजी जो साथ साथ
किलकारी की बाँसुरी
री री पी पी बोली।
क्या सुर सजे हैं
आरकेस्ट्रा की टोली।
टोली हमजोली बीच
सब मटकने लगे हैं।
द्वार खुला मन का,कली कहीं दिल का
चटखने लगे हैं।
बाँके-बिहारीजी मस्त-मगन उगडुब
डगर-मगर डगमग,भाग रहा डुगडुग।
उलट पलट देखता कि देखूँ क्या होई
छिटक छिटक भागे कि पकड़े ना कोई।

खिलखिला उठा क्या,दिगंत खिलखिलाया
मार कर मुस्की,सिर को हिलाया।
गुस्सा भी प्यारा,प्यारा है रोना
आनंद की वर्षा,तन-मन भींगोना।

मगर जो न रुकते वसंत के चपल-चरण
बीता बस चार दिन,आ गया वो हीं क्षण।
लौट क्या गया वो,लौट गया सब कुछ
खाली खाली दिन फिर,और रातें छुछ छुछ।
सुहानी-सी यादें,सुवासित ज्यों इत्र इत्र
दिल के अलबम में,छोड़ गया स्मृति-चित्र।
करीने से उसी को,उलटता-पलटता
खालीपन भरता और,समय को सलटता।
         __अशोक झा 'दुलार'

मंगलवार, 21 मई 2019

रात इक पहेली है
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दिन-दूल्हे से रूठी रात-दुल्हनियाँ
 ऐसी कि बनी कभी ना बात।
दिन आ आ बुला कर चला गया
तब पीछे छुपकर आती रात।

मिले कभी ना प्रियतम पथ में
रहती सदा अकेली है।
चाँद-सितारों से सजती-संवरती
ये रात इक पहेली है।
     __अशोक झा 'दुलार'

शनिवार, 18 मई 2019

            इससे कि पहले
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इससे पहले कि वक़्त फिसल जाए
इससे पहले कि मौसम बदल जाए
चलो अभी कुछ तूफानी कर जाएँ
चलो अभी कुछ नूरानी कर जाएँ
क्या पता कि कल हमहीं हो न हो
क्या पता कि कल तुम्हीं हो न हो
आज और अभी ये घड़ी  है हमारा
जोशे-जुनून है और साथ है तुम्हारा
क्यूँ व्यर्थ वक़्त को यूँ बर्बाद करें
क्यूँ न खुद को, जहां को आबाद करें

शुक्रवार, 17 मई 2019

दस्तक देते हाथ थके
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चाहा समेट लूँ सारी खुशियाँ
झटपट अपनी झोली में।
बिन-ब्याहे दौलत-दुल्हन को
ले आऊँ अपनी डोली में।
जहमत कौन उठाए उतना
छोटी-सी जिंदगानी है।
नाहक 'कु' 'सु' मार्ग-विवेचन
समय गँवाना बेमानी है।

चलकर पहुँचा मैं मार्ग अनोखा
आनंद-नगर के सिंह-द्वार।
ज्यों हाथ बढ़ा उन्मत्त-आवेग में
खुला कहाँ वो बज्र-किबाड़।
सिर पटक-झटक रोया-चिल्लाया
दस्तक देते हाथ थके।
मंजिल-मार्ग का मूल्य-संतुलन
बिन चुकता ना राह लखे।
दस्तक देते हाथ थके
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चाहा समेट लूँ सारी खुशियाँ
झटपट अपनी झोली में।
बिन-ब्याहे दौलत-दुल्हन को
ले आऊँ अपनी डोली में।
जहमत कौन उठाए उतना
छोटी-सी जिंदगानी है।
नाहक 'कु' 'सु' मार्ग-विवेचन
समय गँवाना बेमानी
चलकर पहुँचा मैं मार्ग अनोखा
आनंद-नगर के सिंह-द्वार।
ज्यों हाथ बढ़ा उन्मत्त-आवेग में
खुला कहाँ वो बज्र-किबाड़।
सिर पटक-झटक रोया-चिल्लाया
दस्तक देते हाथ थके।
मंजिल-मार्ग का मूल्य-संतुलन
बिन चुकता ना राह लखे।
          __अशोक झा'दुलार'

शुक्रवार, 10 मई 2019

आँखें हार गई
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युगों युगों से
मन बाबरी भई।
तेरे रंग रंगी ऐसों
कि दिल माने ना
और आँखें हार गई।

सुध भी तेरी
बुध भी तेरी
सुध-बुध खोई
तू ही तू संसार हुई।
मिट गई हस्ती
मेरी तुझमें
मैं मुझसे ही निकल
प्रेम की दरिया पार गई।
     _अशोक झा'दुलार'