सुहानी-सी यादें
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इक झोंका आया,ताजी ताजी हवा की
दूर-दिल्ली से भी दूर-देश से।
अपना वो जो आया
परदेशी नहीं पर परदेश से।
लंबे बाल,अंदाज सूफियाना
वेश दरवेश से।
वो आया,ज़ुल्फें लहराया
करता डुगडुग डुगडुगी बजाया।
कि खिल गए चतुर्दिक पुष्प-गुच्छ
सारी बगिया महमहा उठी।
चीं चीं करतीं जैसे चिड़िया
समवेत स्वरों से चहचहा उठी।
गाने लगी कोयल, बुलबुल लगी नाचने।
और गोरैया-मैना-कबूतर
सबके सब आए उतर
मेरे मुँडेर पर,लगी कथा बाँचने।
रंग-रंगीली तितली रानी
पंख फड़फड़ाने लगी।
आओ रे आओ,नाचो गाओ,धूम मचाओ
चीजें सहेजी, हड़बड़ाने लगी;
कि दादी-अम्मा बड़बड़ाने लगी।
छप छप छपाक-छप
ढन-ढन-ढनाक-ढन।
लुढ़का लोटा,बोल उठी थाली
टन-टन-टनाक-टन।
झाल-मृदंगम बजी जो साथ साथ
किलकारी की बाँसुरी
री री पी पी बोली।
क्या सुर सजे हैं
आरकेस्ट्रा की टोली।
टोली हमजोली बीच
सब मटकने लगे हैं।
द्वार खुला मन का,कली कहीं दिल का
चटखने लगे हैं।
बाँके-बिहारीजी मस्त-मगन उगडुब
डगर-मगर डगमग,भाग रहा डुगडुग।
उलट पलट देखता कि देखूँ क्या होई
छिटक छिटक भागे कि पकड़े ना कोई।
खिलखिला उठा क्या,दिगंत खिलखिलाया
मार कर मुस्की,सिर को हिलाया।
गुस्सा भी प्यारा,प्यारा है रोना
आनंद की वर्षा,तन-मन भींगोना।
मगर जो न रुकते वसंत के चपल-चरण
बीता बस चार दिन,आ गया वो हीं क्षण।
लौट क्या गया वो,लौट गया सब कुछ
खाली खाली दिन फिर,और रातें छुछ छुछ।
सुहानी-सी यादें,सुवासित ज्यों इत्र इत्र
दिल के अलबम में,छोड़ गया स्मृति-चित्र।
करीने से उसी को,उलटता-पलटता
खालीपन भरता और,समय को सलटता।
__अशोक झा 'दुलार'
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इक झोंका आया,ताजी ताजी हवा की
दूर-दिल्ली से भी दूर-देश से।
अपना वो जो आया
परदेशी नहीं पर परदेश से।
लंबे बाल,अंदाज सूफियाना
वेश दरवेश से।
वो आया,ज़ुल्फें लहराया
करता डुगडुग डुगडुगी बजाया।
कि खिल गए चतुर्दिक पुष्प-गुच्छ
सारी बगिया महमहा उठी।
चीं चीं करतीं जैसे चिड़िया
समवेत स्वरों से चहचहा उठी।
गाने लगी कोयल, बुलबुल लगी नाचने।
और गोरैया-मैना-कबूतर
सबके सब आए उतर
मेरे मुँडेर पर,लगी कथा बाँचने।
रंग-रंगीली तितली रानी
पंख फड़फड़ाने लगी।
आओ रे आओ,नाचो गाओ,धूम मचाओ
चीजें सहेजी, हड़बड़ाने लगी;
कि दादी-अम्मा बड़बड़ाने लगी।
छप छप छपाक-छप
ढन-ढन-ढनाक-ढन।
लुढ़का लोटा,बोल उठी थाली
टन-टन-टनाक-टन।
झाल-मृदंगम बजी जो साथ साथ
किलकारी की बाँसुरी
री री पी पी बोली।
क्या सुर सजे हैं
आरकेस्ट्रा की टोली।
टोली हमजोली बीच
सब मटकने लगे हैं।
द्वार खुला मन का,कली कहीं दिल का
चटखने लगे हैं।
बाँके-बिहारीजी मस्त-मगन उगडुब
डगर-मगर डगमग,भाग रहा डुगडुग।
उलट पलट देखता कि देखूँ क्या होई
छिटक छिटक भागे कि पकड़े ना कोई।
खिलखिला उठा क्या,दिगंत खिलखिलाया
मार कर मुस्की,सिर को हिलाया।
गुस्सा भी प्यारा,प्यारा है रोना
आनंद की वर्षा,तन-मन भींगोना।
मगर जो न रुकते वसंत के चपल-चरण
बीता बस चार दिन,आ गया वो हीं क्षण।
लौट क्या गया वो,लौट गया सब कुछ
खाली खाली दिन फिर,और रातें छुछ छुछ।
सुहानी-सी यादें,सुवासित ज्यों इत्र इत्र
दिल के अलबम में,छोड़ गया स्मृति-चित्र।
करीने से उसी को,उलटता-पलटता
खालीपन भरता और,समय को सलटता।
__अशोक झा 'दुलार'
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