रात इक पहेली है
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दिन-दूल्हे से रूठी रात-दुल्हनियाँ
ऐसी कि बनी कभी ना बात।
दिन आ आ बुला कर चला गया
तब पीछे छुपकर आती रात।
मिले कभी ना प्रियतम पथ में
रहती सदा अकेली है।
चाँद-सितारों से सजती-संवरती
ये रात इक पहेली है।
__अशोक झा 'दुलार'
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दिन-दूल्हे से रूठी रात-दुल्हनियाँ
ऐसी कि बनी कभी ना बात।
दिन आ आ बुला कर चला गया
तब पीछे छुपकर आती रात।
मिले कभी ना प्रियतम पथ में
रहती सदा अकेली है।
चाँद-सितारों से सजती-संवरती
ये रात इक पहेली है।
__अशोक झा 'दुलार'
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