मंगलवार, 30 अप्रैल 2019

लापता हूँ कब से
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लापता हूँ कब से मैं
खुद को खुद का पता नहीं।
अंधे सुरंग में दौड़ रहा
जाना कहाँ यह  पता नहीं।
दूर कहीं दिखती वो
रौशनी की चौंध-चकमक।
बेतहाशा भागते लोग
भाग रहा मैं भी अहमक।
पीछे छाया घुप्प अंधेरा
आकांक्षाओं के उत्ताल-तरंग।
जिंदगी हो रही तमाम
छोड़ अपने, हो रहा नि:स्संग।
लापता हूँ कब से मैं
खुद को खुद का पता नहीं।
फलाफल कर्म का हीं
और किसी की खता नहीं।

शनिवार, 27 अप्रैल 2019

आँखें न पढ़ सके तुम
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बुद्धि गढ़ता शब्द है जो
मन ही में उपजे भाव से।
मस्तिष्क करता कारीगरी
मन-मिजाज स्वभाव से।

हैं शब्द सीमाबद्ध होते
हर भाव वहन न कर पाते।
शब्दातीत आँखों की भाषा
अव्यक्त व्यक्त भी कर जाते।

पर हाय! मेरे शब्दों पै अटके
मेरी आँखें न पढ़ सके तुम।
भावनाओं के उमड़ते ज्वार पै
नाव दिल की ना चढ़ सके तुम।
      __अशोक झा'दुलार'

शुक्रवार, 26 अप्रैल 2019

ऐ दिल मुझे सम्भाल
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तन का नहीं भरोसा
मन की बहकती चाल।
इधर-उधर डगमगाऊँ
ऐ दिल मुझे सम्भाल।।

देता न दिल है धोखा
जाने वो सच्चा हाल।
पूछ करे कुछ दिलसे
फिर क्यूँ रहे मलाल!!

दिल की कही बातें
हरगिज़ ना देवें टाल।
बसते वहाँ स्वयं हैं
राम-रहीम-गोपाल।।
   __अशोक झा 'दुलार'

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2019


हमने आँसू छुपा लिए
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कुछ अपनों का दिया ज़ख़्म था
जिसके लिए मरे-जिए थे।
दुनिया में क़ायम रहे भरोसा
हमने आँसू छुपा लिए थे।।

भरोसे पर ही चलती दुनियादारी
भरम ही सही ज़रूरी है।
भरोसेमंद अगरचे होते नहीं सब
होती कुछ की मज़बूरी है।
समझ यहीं होंठों को सिल दिए थे
हमने आँसू छुपा लिए थे।।
     __अशोक झा'दुलार'

सोमवार, 15 अप्रैल 2019


जूड़-शीतल केर हमर बधाइ
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आइ जरूरति बेशी जुड़बाक
भेल जाइछ सब फूट-फराक।
फूसि  फासि  मे बात  बढ़ैए
मचि जाइत अछि तू-तड़ाक।।

कटल जड़ि कि जग बौरायब
जड़िए जुड़ने होयब मजगूत ।
जुड़ि-जुड़ाउ परिवार समाज के
टूटय नहि कौखन नेहक सूत।।

तन शीतल तऽ धनोक बले
नहि हो ताँय मुदा मन शांत।
ईर्ष्या-द्वेष-घृणा विषाणु-युक्त
मन विषण्ण रहय अछि क्लांत।।

मन केर कूप के स्वच्छ करी
दया-प्रेम  केर  डारि  दबाइ।
जुड़ी-जुड़ाबी  जन-जन केर
जड़-चेतन संग चलू बतियाइ।।

जीव-जंतु संग गाछ-बिरिछ
थोड़बो हमरो सन सँ जुड़ाइ।
तन हो शीतल मन हो शीतल
"जूड़ि-शीतल"के हमर बधाइ।।
      __अशोक झा 'दुलार'

रविवार, 14 अप्रैल 2019

शाम की उदासी
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शाम की फैली उदासी में
होता है हर शय  उदास ।
बिछड़ने का सूरज से शायद
मन में कहीं छाती एहसास।

परत पर परत स्याह-सी
उतर उतर आती है रात।
पीकर उजाले को बेरहम
पालता भरम कि दिया मात।

अँधेरगर्दी मगर चलती कहाँ
नित नव सूरज लाता प्रभात।
मानता हूँ अहमियत तेरी भी
क़ीमत उजाले की तुझी से स्यात।
       __अशोक झा 'दुलार'

मंगलवार, 9 अप्रैल 2019

थोड़ा-सा इंतज़ार करो
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मत हो अधीर
मत हो निराश
बस, थोड़ा-सा इंतज़ार करो।
छँटेगा अँधेरा
छँटेगें हीं धुंध
मज़े उसके भी,ना तिरस्कार करो।
रूठे हैं अपने
मुँह फेर खड़े
थोड़ा मान,थोड़ा मनुहार करो।
लगन लक्ष्य की
विघ्न-पहाड़ चढ़
श्रमजल से धरा का श्रृंगार करो।
नफ़रतों की दीवारें
दूरियां दिलों की
ढहाकर पाट दो,ढेरों प्यार करो।
मत हो अधीर
मत हो निराश
बस,थोड़ा सा इंतज़ार करो ।
        __अशोक झा'दुलार'

मंगलवार, 2 अप्रैल 2019

लम्हों के परिंदे

लम्हों के परिंदे
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पंख खोलकर उड़ता जाए
यादों के आसमान में
उड़ते लम्हों के परिंदे
कुछ कह कह जाए कान में।।

पल भर रुकना ना जाने
गाँव-शहर सुनसान में
अंतहीन अविराम यात्री
सुख-दुख एक समान में
लौ एक हीं जल रही है
सब जीवों के प्राण में
उड़ते लम्हों के परिंदे
कुछ कह कह जाए कान में।।
कितनी कड़वी यादें हों पर
बीती हुई कहानी होती
कितनी मीठी यादें हों पर
रीती हुई जिंदगानी होती
सीख भूत से भविष्य सँवारें
कर्म फलित हो ज्ञान में
उड़ते लम्हों के परिंदे
कुछ कह कह जाए कान में।।
करुणा-दया भरे हिय-घट
पाप-पुण्य वितण्डा छोड़
मानवता रक्षार्थ सदा हीं
देवें सारी रस्में तोड़
प्रेम मात्र हीं मूल धर्म का
ना मिलता किसी दुकान में
उड़ते लम्हों के परिंदे
कुछ कह कह जाए कान में।।