जूड़-शीतल केर हमर बधाइ
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आइ जरूरति बेशी जुड़बाक
भेल जाइछ सब फूट-फराक।
फूसि फासि मे बात बढ़ैए
मचि जाइत अछि तू-तड़ाक।।
कटल जड़ि कि जग बौरायब
जड़िए जुड़ने होयब मजगूत ।
जुड़ि-जुड़ाउ परिवार समाज के
टूटय नहि कौखन नेहक सूत।।
तन शीतल तऽ धनोक बले
नहि हो ताँय मुदा मन शांत।
ईर्ष्या-द्वेष-घृणा विषाणु-युक्त
मन विषण्ण रहय अछि क्लांत।।
मन केर कूप के स्वच्छ करी
दया-प्रेम केर डारि दबाइ।
जुड़ी-जुड़ाबी जन-जन केर
जड़-चेतन संग चलू बतियाइ।।
जीव-जंतु संग गाछ-बिरिछ
थोड़बो हमरो सन सँ जुड़ाइ।
तन हो शीतल मन हो शीतल
"जूड़ि-शीतल"के हमर बधाइ।।
__अशोक झा 'दुलार'
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