मंगलवार, 30 अप्रैल 2019

लापता हूँ कब से
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लापता हूँ कब से मैं
खुद को खुद का पता नहीं।
अंधे सुरंग में दौड़ रहा
जाना कहाँ यह  पता नहीं।
दूर कहीं दिखती वो
रौशनी की चौंध-चकमक।
बेतहाशा भागते लोग
भाग रहा मैं भी अहमक।
पीछे छाया घुप्प अंधेरा
आकांक्षाओं के उत्ताल-तरंग।
जिंदगी हो रही तमाम
छोड़ अपने, हो रहा नि:स्संग।
लापता हूँ कब से मैं
खुद को खुद का पता नहीं।
फलाफल कर्म का हीं
और किसी की खता नहीं।

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