मंगलवार, 2 अप्रैल 2019

लम्हों के परिंदे

लम्हों के परिंदे
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पंख खोलकर उड़ता जाए
यादों के आसमान में
उड़ते लम्हों के परिंदे
कुछ कह कह जाए कान में।।

पल भर रुकना ना जाने
गाँव-शहर सुनसान में
अंतहीन अविराम यात्री
सुख-दुख एक समान में
लौ एक हीं जल रही है
सब जीवों के प्राण में
उड़ते लम्हों के परिंदे
कुछ कह कह जाए कान में।।
कितनी कड़वी यादें हों पर
बीती हुई कहानी होती
कितनी मीठी यादें हों पर
रीती हुई जिंदगानी होती
सीख भूत से भविष्य सँवारें
कर्म फलित हो ज्ञान में
उड़ते लम्हों के परिंदे
कुछ कह कह जाए कान में।।
करुणा-दया भरे हिय-घट
पाप-पुण्य वितण्डा छोड़
मानवता रक्षार्थ सदा हीं
देवें सारी रस्में तोड़
प्रेम मात्र हीं मूल धर्म का
ना मिलता किसी दुकान में
उड़ते लम्हों के परिंदे
कुछ कह कह जाए कान में।।

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