हँसना भूल गए
***************
जुटाने में सामां एशो-आराम के
मशगूल हुए इतने कि लोग
हँसना भूल गए।
ठंडी छाँव की चाहत लिए मन में
नंगे पाँव दौड़ रहे धूप-कड़ी
कि ठहरना भूल गए।
डोर रिश्तों की रेशमी मखमली-सी
तार तार होते चले गए कब से
बेखबर,सहेजना भूल गए।
आपा-धापी कैसी मची हुई है कि
फुर्सत नहीं मिलती मिलने की
सुकून से जीना भूल गए।
***************
जुटाने में सामां एशो-आराम के
मशगूल हुए इतने कि लोग
हँसना भूल गए।
ठंडी छाँव की चाहत लिए मन में
नंगे पाँव दौड़ रहे धूप-कड़ी
कि ठहरना भूल गए।
डोर रिश्तों की रेशमी मखमली-सी
तार तार होते चले गए कब से
बेखबर,सहेजना भूल गए।
आपा-धापी कैसी मची हुई है कि
फुर्सत नहीं मिलती मिलने की
सुकून से जीना भूल गए।
