सोमवार, 24 अक्टूबर 2016

जगमग जोत जले

जगमग जोत जले

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जगमग जोत जले
जगत में जगमग जोत जले।
सुख-शांति की अविरल धारा
सब हो भले भले ।
जग में जगमग जोत जले ।।


अंधकार क्यूँ लील ले
जगती के उजाले को।
उठो प्रचंड प्रहार करो
तोड़ दीनता ताले को ।
दुष्ट-दानवी शक्ति की
अब न एक चले ।
जगत में जगमग जोत जले।।


रोड़ घोर गर्जन कठोर
तिमिराछन्न गगन है।
अज्ञानान्ध मद मोह लोभवश
मनुज दनुज बना मगन है।
दानवता दुर्दान्त हो कितने,
आशा छाँव तले
जगत में जगमग जोत जले ।।


सूरज-सा जल जल कर
प्रखर किरण तम हरना होगा।
हिमशैल -सा गल गल कर
शीतल जल सा बहना होगा ।
सागर नदिया-सी समा कर
गले गले से मिले गले।
जगत में जगमग जोत जले ।।


सत्य न हारा ना अब हारेगा
कितने प्रपंच कोई कर ले ।
धन-पद-मद की मोहिनी माया
बुद्धि-विवेक न हर ले ।
'तमसो मा ज्योतिर्गमय'
आ, मिलकर साथ चले।
जगत में जगमग जोत जले ।।
---अशोक झा "दुलार"