सोमवार, 2 दिसंबर 2019

      हँसना भूल गए
   ***************
जुटाने में सामां एशो-आराम के
मशगूल हुए इतने कि लोग
हँसना भूल गए।

ठंडी छाँव की चाहत लिए मन में
नंगे पाँव दौड़ रहे धूप-कड़ी
कि ठहरना भूल गए।

डोर रिश्तों की रेशमी मखमली-सी
तार तार होते चले गए कब से
बेखबर,सहेजना भूल गए।

आपा-धापी कैसी मची हुई है कि
फुर्सत नहीं मिलती मिलने की
सुकून से जीना भूल गए।
bahar-32

1. 1222 1222 1222 1222
2. 2122 1212 22
3. 11212 11212 11212 11212
4. 1212 1122 1212 22
5. 221 2122 221 2122
6. 221 2121 1221 212
7. 122 122 122
8. 122 122 122 122
9. 122 122 122 12
10. 212 212 212
11. 212 212 212 2
12. 212 212 212 212
13. 1212 212 122 1212 212 22
14. 2212 2212
15. 2212 1212
16. 2212 2212 2212
17. 2212 2212 2212 2212
18. 2122 2122
19. 2122 1122 22
20. 2122 2122 212
21. 2122 2122 2122
22. 2122 2122 21222 212
23. 2122 1122 1122 22
24. 1121 2122 1121 2122
25. 2122 2122 2122 2122
26. 1222 1222 122
27. 1222 1222 1222
28. 221 1221 1221 122
29. 221 1222 221 1222
30. 212 1222 212 1222
31. 212 1212 1212 1212
32. 1212 1212 1212 1212

शुक्रवार, 8 नवंबर 2019

उत्तिष्ठ गोविन्द त्यज निद्रां जगत्पतये। त्वयि सुप्ते जगन्नाथ जगत् सुप्तं भवेदिदम्॥
उत्थिते चेष्टते सर्वमुत्तिष्ठोत्तिष्ठ माधव। गतामेघा वियच्चैव निर्मलं निर्मलादिशः॥
शारदानि च पुष्पाणि गृहाण मम केशव

मंगलवार, 5 नवंबर 2019

गुस्सा कहीं का उतारा कहीं
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लटकाए मुँह घर हैं लौटे मियाँ
गुस्सा कहीं का उतारा कहीं।

इम्तिहान सब्र का इतना न लो
झूठे वायदे अब और गवारा नहीं।

खुद की अदालत कठघरे हो खड़े
जिरह खुद से किया करारा कभी!

गड़े मुर्दे उखाड़ते क्यूँ बार बार
हाँडी काठ की चढ़ती दुबारा नहीं।

ज़हर फिज़ा में ये कैसी घुली है
घुटता है दम क्या तुम्हारा नहीं!

अब भी तो संभलो अरे नादानों
कहर कुदरत दिखाता नज़ारा नहीं?

शुक्रवार, 19 जुलाई 2019



पैबस्त है तू मुझमें
कुछ इस तरह
कि मैं रहूँ ना रहूँ
तू हीं तू रह जाएगा।
जब मैं नहीं
मेरे किस्से रह जाएँगे
उन किस्सों में हीं
तू भी रह पाएगा।
साथ न हो कर भी साथ मेरे

मंगलवार, 9 जुलाई 2019

सुख की बदली छाई

   सुख की बदली छाई
----------------------++
प्यासी धरती की सुन पुकार
आसमान झुक आया,
दु:ख-द्रवित हो नयन-नीर से
मेघा को बरसाया।

बीत गए दिन दुख के
सुख की बदली छाई,
अंकवार ले वारि-धार को
रसवंती धरती मुसकाई।

पुलकित गात रोमांचित रोमावलि
द्रुम-दल झूम रहे हैं,
पवन झकोर घन-गर्जन घोर
तृषित धरा को चूम रहे हैं।

केश खुले ज्यों वेश खुले
लता-गुल्म लहराते हैं,
झिनझिन झिंगुर टर्रटर्र दादुर
मेघा-राग सुनाते हैं।

प्यास बुझी  उमड़ी नेहा
नदिया तट को तोड़ चली,
आकुल-व्याकुल उछल तड़पकर
मिलने सागर ओर चली।

मिटे ताप संताप सभी
इंद्रधनुष नभ छाया,
धरा-गगन के मधुर मिलन से
अग-जग सब हर्षाया।
    __अशोक झा'दुलार'


बुधवार, 19 जून 2019

हुआ सो हुआ
**********
ऐ दिले नादान
तुझे हुआ क्या है?
क्यूं भटके है जहान
क्यूं फ़िक्र इतनी
भला क्या बुरा क्या है?
तू छोड़ तो सही
परवरदिगार पर
जाने अब वहीं
दुआ क्या बद्दुआ क्या है!
जो हुआ सो हुआ
भुला दे उसे
पाप क्या पुण्य क्या
किसी से अनछुआ क्या है?

मंगलवार, 28 मई 2019

फ़ासला भी ज़रूरी है
******************
होती कभी तो मज़बूरी है
अनचाही हो जाती दूरी है।
और कभी लगता है ऐसा
यह फ़ासला भी ज़रूरी है।।

भाग रहा जीवन पल-छिन
रह जाती समझ अधूरी है।
पास पास रहकर हरदम हीं
महत्त्व  न दिखता पूरी है।।
हममें ये फ़ासला ज़रूरी है।।

शनिवार, 25 मई 2019

चेहरे के पीछे चेहरा है
-----------------------
दिखता वो जो है नहीं
तन कहीं और मन कहीं
भीतर भभकता गंद बड़ी
कुत्सित कुंठा गहरा है
चेहरे के पीछे चेहरा है।।

लगता ऐसा सुनता सबका
करता है बस अपने मन का
कानों पर तो जूं न रेंगे
सच में वो तो बहरा है
चेहरे के पीछे चेहरा है।।

लूटमार कर महल खड़ा
ऐशगाह है भरा पड़ा
असलियत ना दिख जाए
पहरों पै लगा पहरा है
चेहरे के पीछे चेहरा है।।
  _अशोक झा'दुलार'
काम करो और बातें कम
******************
बातों से बात नहीं बनती
काम किए जा छोड़ शरम।
गाँठ बाँध लो मंत्र सरीखा
काम से जाता दुर्दिन थम।
काम करो और बातें कम।।

हैं जो कर्मठ बातों में उनकी
ठसक अलग और होता दम।
कैसी भी हो हालात मगर
घेर ना पाता उनको ग़म।
काम करो और बातें कम।।

कर्महीन हीं भाग्य भरोसे
बैठे रहते हैं हरदम।
कर्म बिना फल की चाहत
पाला करता है वो भरम।
काम करो और बातें कम।।

लगे काम में,दु:ख बिसराता
कुदरत का भी यहीं नियम।
काम से काम रखे हर कोई
इससे बढ़कर कौन धरम।
काम करो और बातें कम।।
   __अशोक झा'दुलार'

बुधवार, 22 मई 2019

सुहानी-सी यादें
-------------------
इक झोंका आया,ताजी ताजी हवा की
दूर-दिल्ली से भी दूर-देश से।
अपना वो जो आया
परदेशी नहीं पर परदेश से।
लंबे बाल,अंदाज सूफियाना
वेश दरवेश से।

वो आया,ज़ुल्फें लहराया
करता डुगडुग डुगडुगी बजाया।
कि खिल गए चतुर्दिक पुष्प-गुच्छ
सारी बगिया महमहा उठी।
चीं चीं करतीं जैसे चिड़िया
समवेत स्वरों से चहचहा उठी।
गाने लगी कोयल, बुलबुल लगी नाचने।
और गोरैया-मैना-कबूतर
सबके सब आए उतर
मेरे मुँडेर पर,लगी कथा बाँचने।

रंग-रंगीली तितली रानी
पंख फड़फड़ाने लगी।
आओ रे आओ,नाचो गाओ,धूम मचाओ
चीजें सहेजी, हड़बड़ाने लगी;
कि दादी-अम्मा बड़बड़ाने लगी।
छप छप छपाक-छप
ढन-ढन-ढनाक-ढन।
लुढ़का लोटा,बोल उठी थाली
टन-टन-टनाक-टन।
झाल-मृदंगम बजी जो साथ साथ
किलकारी की बाँसुरी
री री पी पी बोली।
क्या सुर सजे हैं
आरकेस्ट्रा की टोली।
टोली हमजोली बीच
सब मटकने लगे हैं।
द्वार खुला मन का,कली कहीं दिल का
चटखने लगे हैं।
बाँके-बिहारीजी मस्त-मगन उगडुब
डगर-मगर डगमग,भाग रहा डुगडुग।
उलट पलट देखता कि देखूँ क्या होई
छिटक छिटक भागे कि पकड़े ना कोई।

खिलखिला उठा क्या,दिगंत खिलखिलाया
मार कर मुस्की,सिर को हिलाया।
गुस्सा भी प्यारा,प्यारा है रोना
आनंद की वर्षा,तन-मन भींगोना।

मगर जो न रुकते वसंत के चपल-चरण
बीता बस चार दिन,आ गया वो हीं क्षण।
लौट क्या गया वो,लौट गया सब कुछ
खाली खाली दिन फिर,और रातें छुछ छुछ।
सुहानी-सी यादें,सुवासित ज्यों इत्र इत्र
दिल के अलबम में,छोड़ गया स्मृति-चित्र।
करीने से उसी को,उलटता-पलटता
खालीपन भरता और,समय को सलटता।
         __अशोक झा 'दुलार'

मंगलवार, 21 मई 2019

रात इक पहेली है
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दिन-दूल्हे से रूठी रात-दुल्हनियाँ
 ऐसी कि बनी कभी ना बात।
दिन आ आ बुला कर चला गया
तब पीछे छुपकर आती रात।

मिले कभी ना प्रियतम पथ में
रहती सदा अकेली है।
चाँद-सितारों से सजती-संवरती
ये रात इक पहेली है।
     __अशोक झा 'दुलार'

शनिवार, 18 मई 2019

            इससे कि पहले
         -----------------------
इससे पहले कि वक़्त फिसल जाए
इससे पहले कि मौसम बदल जाए
चलो अभी कुछ तूफानी कर जाएँ
चलो अभी कुछ नूरानी कर जाएँ
क्या पता कि कल हमहीं हो न हो
क्या पता कि कल तुम्हीं हो न हो
आज और अभी ये घड़ी  है हमारा
जोशे-जुनून है और साथ है तुम्हारा
क्यूँ व्यर्थ वक़्त को यूँ बर्बाद करें
क्यूँ न खुद को, जहां को आबाद करें

शुक्रवार, 17 मई 2019

दस्तक देते हाथ थके
#############
चाहा समेट लूँ सारी खुशियाँ
झटपट अपनी झोली में।
बिन-ब्याहे दौलत-दुल्हन को
ले आऊँ अपनी डोली में।
जहमत कौन उठाए उतना
छोटी-सी जिंदगानी है।
नाहक 'कु' 'सु' मार्ग-विवेचन
समय गँवाना बेमानी है।

चलकर पहुँचा मैं मार्ग अनोखा
आनंद-नगर के सिंह-द्वार।
ज्यों हाथ बढ़ा उन्मत्त-आवेग में
खुला कहाँ वो बज्र-किबाड़।
सिर पटक-झटक रोया-चिल्लाया
दस्तक देते हाथ थके।
मंजिल-मार्ग का मूल्य-संतुलन
बिन चुकता ना राह लखे।
दस्तक देते हाथ थके
------------------------
चाहा समेट लूँ सारी खुशियाँ
झटपट अपनी झोली में।
बिन-ब्याहे दौलत-दुल्हन को
ले आऊँ अपनी डोली में।
जहमत कौन उठाए उतना
छोटी-सी जिंदगानी है।
नाहक 'कु' 'सु' मार्ग-विवेचन
समय गँवाना बेमानी
चलकर पहुँचा मैं मार्ग अनोखा
आनंद-नगर के सिंह-द्वार।
ज्यों हाथ बढ़ा उन्मत्त-आवेग में
खुला कहाँ वो बज्र-किबाड़।
सिर पटक-झटक रोया-चिल्लाया
दस्तक देते हाथ थके।
मंजिल-मार्ग का मूल्य-संतुलन
बिन चुकता ना राह लखे।
          __अशोक झा'दुलार'

शुक्रवार, 10 मई 2019

आँखें हार गई
***********                              तकती राहें
युगों युगों से
मन बाबरी भई।
तेरे रंग रंगी ऐसों
कि दिल माने ना
और आँखें हार गई।

सुध भी तेरी
बुध भी तेरी
सुध-बुध खोई
तू ही तू संसार हुई।
मिट गई हस्ती
मेरी तुझमें
मैं मुझसे ही निकल
प्रेम की दरिया पार गई।
     _अशोक झा'दुलार'

मंगलवार, 30 अप्रैल 2019

लापता हूँ कब से
************
लापता हूँ कब से मैं
खुद को खुद का पता नहीं।
अंधे सुरंग में दौड़ रहा
जाना कहाँ यह  पता नहीं।
दूर कहीं दिखती वो
रौशनी की चौंध-चकमक।
बेतहाशा भागते लोग
भाग रहा मैं भी अहमक।
पीछे छाया घुप्प अंधेरा
आकांक्षाओं के उत्ताल-तरंग।
जिंदगी हो रही तमाम
छोड़ अपने, हो रहा नि:स्संग।
लापता हूँ कब से मैं
खुद को खुद का पता नहीं।
फलाफल कर्म का हीं
और किसी की खता नहीं।

शनिवार, 27 अप्रैल 2019

आँखें न पढ़ सके तुम
****************
बुद्धि गढ़ता शब्द है जो
मन ही में उपजे भाव से।
मस्तिष्क करता कारीगरी
मन-मिजाज स्वभाव से।

हैं शब्द सीमाबद्ध होते
हर भाव वहन न कर पाते।
शब्दातीत आँखों की भाषा
अव्यक्त व्यक्त भी कर जाते।

पर हाय! मेरे शब्दों पै अटके
मेरी आँखें न पढ़ सके तुम।
भावनाओं के उमड़ते ज्वार पै
नाव दिल की ना चढ़ सके तुम।
      __अशोक झा'दुलार'

शुक्रवार, 26 अप्रैल 2019

ऐ दिल मुझे सम्भाल
*************
तन का नहीं भरोसा
मन की बहकती चाल।
इधर-उधर डगमगाऊँ
ऐ दिल मुझे सम्भाल।।

देता न दिल है धोखा
जाने वो सच्चा हाल।
पूछ करे कुछ दिलसे
फिर क्यूँ रहे मलाल!!

दिल की कही बातें
हरगिज़ ना देवें टाल।
बसते वहाँ स्वयं हैं
राम-रहीम-गोपाल।।
   __अशोक झा 'दुलार'

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2019


हमने आँसू छुपा लिए
****************
कुछ अपनों का दिया ज़ख़्म था
जिसके लिए मरे-जिए थे।
दुनिया में क़ायम रहे भरोसा
हमने आँसू छुपा लिए थे।।

भरोसे पर ही चलती दुनियादारी
भरम ही सही ज़रूरी है।
भरोसेमंद अगरचे होते नहीं सब
होती कुछ की मज़बूरी है।
समझ यहीं होंठों को सिल दिए थे
हमने आँसू छुपा लिए थे।।
     __अशोक झा'दुलार'

सोमवार, 15 अप्रैल 2019


जूड़-शीतल केर हमर बधाइ
*******************
आइ जरूरति बेशी जुड़बाक
भेल जाइछ सब फूट-फराक।
फूसि  फासि  मे बात  बढ़ैए
मचि जाइत अछि तू-तड़ाक।।

कटल जड़ि कि जग बौरायब
जड़िए जुड़ने होयब मजगूत ।
जुड़ि-जुड़ाउ परिवार समाज के
टूटय नहि कौखन नेहक सूत।।

तन शीतल तऽ धनोक बले
नहि हो ताँय मुदा मन शांत।
ईर्ष्या-द्वेष-घृणा विषाणु-युक्त
मन विषण्ण रहय अछि क्लांत।।

मन केर कूप के स्वच्छ करी
दया-प्रेम  केर  डारि  दबाइ।
जुड़ी-जुड़ाबी  जन-जन केर
जड़-चेतन संग चलू बतियाइ।।

जीव-जंतु संग गाछ-बिरिछ
थोड़बो हमरो सन सँ जुड़ाइ।
तन हो शीतल मन हो शीतल
"जूड़ि-शीतल"के हमर बधाइ।।
      __अशोक झा 'दुलार'

रविवार, 14 अप्रैल 2019

शाम की उदासी
************
शाम की फैली उदासी में
होता है हर शय  उदास ।
बिछड़ने का सूरज से शायद
मन में कहीं छाती एहसास।

परत पर परत स्याह-सी
उतर उतर आती है रात।
पीकर उजाले को बेरहम
पालता भरम कि दिया मात।

अँधेरगर्दी मगर चलती कहाँ
नित नव सूरज लाता प्रभात।
मानता हूँ अहमियत तेरी भी
क़ीमत उजाले की तुझी से स्यात।
       __अशोक झा 'दुलार'

मंगलवार, 9 अप्रैल 2019

थोड़ा-सा इंतज़ार करो
*****************
मत हो अधीर
मत हो निराश
बस, थोड़ा-सा इंतज़ार करो।
छँटेगा अँधेरा
छँटेगें हीं धुंध
मज़े उसके भी,ना तिरस्कार करो।
रूठे हैं अपने
मुँह फेर खड़े
थोड़ा मान,थोड़ा मनुहार करो।
लगन लक्ष्य की
विघ्न-पहाड़ चढ़
श्रमजल से धरा का श्रृंगार करो।
नफ़रतों की दीवारें
दूरियां दिलों की
ढहाकर पाट दो,ढेरों प्यार करो।
मत हो अधीर
मत हो निराश
बस,थोड़ा सा इंतज़ार करो ।
        __अशोक झा'दुलार'

मंगलवार, 2 अप्रैल 2019

लम्हों के परिंदे

लम्हों के परिंदे
************
पंख खोलकर उड़ता जाए
यादों के आसमान में
उड़ते लम्हों के परिंदे
कुछ कह कह जाए कान में।।

पल भर रुकना ना जाने
गाँव-शहर सुनसान में
अंतहीन अविराम यात्री
सुख-दुख एक समान में
लौ एक हीं जल रही है
सब जीवों के प्राण में
उड़ते लम्हों के परिंदे
कुछ कह कह जाए कान में।।
कितनी कड़वी यादें हों पर
बीती हुई कहानी होती
कितनी मीठी यादें हों पर
रीती हुई जिंदगानी होती
सीख भूत से भविष्य सँवारें
कर्म फलित हो ज्ञान में
उड़ते लम्हों के परिंदे
कुछ कह कह जाए कान में।।
करुणा-दया भरे हिय-घट
पाप-पुण्य वितण्डा छोड़
मानवता रक्षार्थ सदा हीं
देवें सारी रस्में तोड़
प्रेम मात्र हीं मूल धर्म का
ना मिलता किसी दुकान में
उड़ते लम्हों के परिंदे
कुछ कह कह जाए कान में।।

रविवार, 31 मार्च 2019

पूछा करो सवाल
************
पूछते रहे हो प्रश्न सिर्फ,सारे जहान के
खुद से भी कभी तो,पूछा करो सवाल।

ऐब ढूढना हीं हमेशा,रही शगल तुम्हारी
कुछ दिखे कि ऐसा,तूने किया कमाल।

करना कुछ कठिन है,बकना बड़ा आसान
चर्चा में बने रहने को,बेबात का बवाल।

किस्से वहीं क्या सुनें,छल गया बारंबार
विक्रम के कंधे अभी वो,जाए ना उस डाल।

भारत के महाभारत में,माया-युद्ध प्रपंच
भोलेभाले भटक भुलावे,जयजय करे निहाल।
         __अशोक झा'दुलार'

शनिवार, 30 मार्च 2019

जो हमारा है नहीं
************
ना जाने क्या बात है
 कोई दिल को क्यूँ गवारा नहीं
पागल बना उसके लिए
जो हमारा है नहीं।

क्या पता उनको कभी
कि कोई मर मिटा है
खयालों में हीं उनके
हालात के हाथों पिटा है
आवारगी है ये कैसी
कि ढूँढे और सहारा नहीं।
पागल बना उसके लिए
जो हमारा है नहीं।।

परवाह हीं नहीं थोड़ी भी
कि आगे क्या अंजाम है
दीवानगी क्या नाम इसी का
नशा कैसी कैसा जाम है
समझ से बाहर समझ है ये
क्या ग़लत है क्या सही।
पागल बना उसके लिए
जो हमारा है नहीं।।

सोमवार, 25 मार्च 2019

[24/3, 12:51 am] अशोक झा 'दुलार': हो हर दिन होली
और हर रात दिवाली।
भरी रहे खुशियों से
जिंदगी की प्याली।
[24/3, 12:58 am] अशोक झा 'दुलार': वर्तमान की नज़र सामने
भविष्य देखता ऊपर है।
बिन बोले तस्वीर बोला
चलता साथ  भू पर है।
[25/3, 5:13 pm] अशोक झा 'दुलार': आज सम्भाले हो तू पापा
कल को मेरा आसमाँ।
तेरे दम से हीं तो मैं भी
कल संभालूँगा सारे जहाँ
[25/3, 5:24 pm] अशोक झा 'दुलार': मेरे कल का, आज है तू।
कल को मैं था,मगर आज
सबके दिल का सरताज है तू।।
[25/3, 5:34 pm] अशोक झा 'दुलार': मैं कड़ी हूँ तुम दोनों का
और, पीढ़ीयों का जंजीर हूँ।
मज़बूत बड़ी पकड़ है मेरी,
स्नेह-सरिता का मैंहीं निर्मल-नीर हूँ।।

रविवार, 24 मार्च 2019

हैप्पी हैप्पी होली
************
प्यार के रंग से रंग दे सबको
नफ़रत की दीवार गिरा दे।
सिरफिरों के सिर पर थोड़ा
हैप्पी हैप्पी हाथ फिरा दे।।
तेरी ताकत ओ बच्चा
दुनिया का सच्चा पूँजी है।
बड़े बड़ों की बिगड़ी बातें
बनने की तू  हीं तो कुंजी है।।
      __अशोक झा'दुलार'
        भूल जाते हैं
     **************
करे कोई भी कितना कुछ
हम इक दिन भूल जाते हैं

किया किसी का थोड़ा सा
हाँकते डींगें  फूल जाते हैं

कड़ी मेहनत किया जिसने
अक्सर हिस्से धूल पाते हैं

भाता नहीं जब भजन भूखे
डालकर फंदा  झूल जाते हैं

पावन कर्म होवें सच्चा तेरा
सब धर्मों का यह मूल पाते हैं
           __अशोक झा'दुलार'

बुधवार, 20 मार्च 2019

रंग भरे इस मौसम में
**************
रंग भरे इस मौसम में
कुछ तो रंग चुरा ले रे।।
बदरंग बनी है दुनियादारी
रंग-गुलाल उड़ा ले रे
रंग-रंगीली आई होली
बिछड़ों को आज मिला ले रे
रंग भरे इस मौसम में
कुछ तो रंग चुरा ले रे।।

वाद-विवाद-प्रतिवाद चले
पर संवाद भी चलने दे
ईर्ष्या-द्वेष,घृणारहित हो
मन से मिलन न टलने दे
औरों के हित-चिंतन से
दिल का दाग़ छुड़ा ले रे।
रंग भरे इस मौसम में
कुछ तो रंग चुरा ले रे।।
   __अशोक झा'दुलार'

मंगलवार, 19 मार्च 2019

क्यों बेरंग पड़े हो
*************
गूंज उठा संगीत धरा पर
हुआ तरंगित जीवन-राग।
उमक उठा है यौवन फिर
है रंग-रंगीला आया फाग।।
रंग-बिरंगे फूल खिले हैं
बदला रंग है धरा-गगन।
महमह मंजर आम्र-विटप
कूकती कोयल हुई मगन।।
नीली अलसी पीली सरसों
औ पलाश-वन लाल लाल।
कोमल-किसलय हरी-भरी
पवन-बसंती, उड़े गुलाल।।
सतरंगे इस मौसम में भी
क्यों बेरंग पड़े हो तुम।
जी लो जीभर इस क्षण को
ठिठके क्यों खड़े हो तुम।।
बीती बातें दो बिसार
ना सोचो क्या कल होगा।
प्रतिपल जी लो जीवन को
जनम सहज सुफल होगा।।
मेरा सफ़र अकेला
****
ये दुनिया के मेले
जिनमें बड़े झमेले
ना गुरु ना चेला
मेरा सफ़र अकेला।

मिलकर साथ चले
मिलते रहे गले
क़िस्मत का हीं खेला
मेरा सफ़र अकेला।

फ़िक्र क्या है करना
मुसीबतों से लड़ना
पास ना हो धेला
मेरा सफ़र अकेला।

मौत से क्या डरना
पड़ेगा ही जब मरना
ये ज़िन्दगी अलबेला
मेरा सफ़र अकेला।

सोमवार, 18 मार्च 2019

हाय, नहीं मिल पाते हम
******************
दिल तो दिल है मचलता है
जब फितुर दिमागी चलता है
उलझे मन की मज़बूरी पर
एक कदम की दूरी पर
खुद का दर्द छुपाते हम
हाय, नहीं मिल पाते हम।।

हैं हज़ारों याद सुहानी
पर कड़वे हीं आगे आतीं
और घुलकर स्मृति-घट में
फेनिल फेनिल ऊपर छाती
खुद भी समझ ना पाते हम
हाय, नहीं मिल पाते हम।।

चाहे जितना जी जला लो
मियाद मगर तो होगी पूरी
घिसते घिसते घिस जाओगे
महकेंगे फिर रिश्ते कस्तूरी
चलो स्वयम् को समझाते हम
हाय, नहीं मिल पाते हम।।
     __अशोक झा'दुलार'

बुधवार, 13 मार्च 2019


ज़िन्दगी तेरे लिए
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ज़िन्दगी तेरे लिए
क्या क्या न किया
बेचैन रहा दिन-रात
पल भर न जिया।
हाय,ये क्या किया
मैंने ये क्या किया!

सोचा थोड़ा सुकूँ से
जीऊँगा ज़िन्दगी
अभी तो उम्र पड़ी है
क्या है धड़फड़ी
और और के फेर में
था लगा हड़बड़ी
उम्र तो तमाम हो गई
कहाँ जीया ज़िन्दगी?

सोमवार, 11 मार्च 2019

मुड़कर भी न देखा
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उसने मुड़कर भी न देखा,
और चला गया।
खड़ा देखता रह गया मैं,
जैसे छला गया।
बोला नहीं शब्द मगर अपनी,
फितरत जतला गया।
रिश्ते रहे मतलब भर शायद,
चुपचाप बतला गया।
उसने मुड़कर भी न देखा,
और चला गया।।
ये बेरुखी ये बेगानापन अरे,
अंदर दहला गया।
टकटकी लगाए रहा देखता,
आँसुओं नहला गया।
बातें याद आई उस दौड़ की,
जो हमें बहला गया।
उसने मुड़कर भी न देखा,
और चला गया।।

सोमवार, 4 मार्च 2019

शिव शंभू,शिव शंकर
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हे शिव शंभू,हे शिव शंकर
हे गंगाधर,हे प्रलयंकर
ताण्डव ऐसा कर दे भू पर
काँप आतंकी डोले थर थर
हे शिव शंभू,हे शिव शंकर।।

मानवता आर्त पुकार रही
रक्षार्थ उठा त्रिशूल भयंकर
जगा जगा अब भाव मसानी
बम-बम हर-हर हो भारत भर
हे शिव शंभू,हे शिव शंकर।।

भर दे भाव अभाव मिटे
कल्मष-कटुता स्वभाव मिटे
सुबुद्धि-विवेक जगे जन जन में
पूजूँ तुझको कंकड़-कंकड़
हे शिव शंभू,हे शिव शंकर।।

गुरुवार, 28 फ़रवरी 2019





इन परिंदों की तरह
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इन परिंदों की तरह अगर
अपना भी होता आकाश।
खींच लकीरें सीमाओं की
आपस में ना लड़ते काश।

उन्मुक्त उड़ान ग़र भर पाते
कैद न होते निज कारावास।
चाह जहाँ बस राह उधर ही
हो सारे जहाँ अपना आवास।

न सीमाओं के आर-पार तब
यूँ गिरते रहते जब-तब  लाश।
फिर क्यूँ होते  ख़ून के प्यासे
मानवता का ना होता ह्रास।

मन हो मुक्त हर कुंठा से
और प्राण न पाए त्रास।
इन परिंदों की तरह सदा
आकुल उड़ान की हो प्यास।

शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2019

  है शहीदों को नमन
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एक बार, बस एक बार
मचाने दो क्रंदन
अरि का करने दो मर्दन
अरे खोल दो बंधन
हमारे भीम अर्जुन का।

कब तक कायराना
छुपा वार वो झेलें
कब तक मूक हो सहें
खाते रहें ढेले
करने दो अब सिंहनाद
हुंकार भरने दो
प्रचंड पुरुषार्थ के आवेग से
प्रहार करने दो
देश के नाज़ के खातिर
प्रतिकार करने दो
आतंकी नरपिशाचों में
नहीं इंसानियत का स्पंदन
अरे खोल दो बंधन
हमारे भीम अर्जुन का।

मुट्ठीभर देशद्रोही जो
सिरे से सिरफिरे हैं ं
मानवाधिकार की आड़ चीखे
ख़ुद मानवता से गिरे हैं
कायर क्लीव वो ढोंगी
जा वैरी से मिले हैं
उन रक्तबीजों का
लहू चाट जाने दो
रणभेरी बजाकर अब
रणभूमि पाट देने दो
वीरों की गर्जना से
प्रकम्पित हो गगन
अरे खोल दो बंधन
हमारे भीम अर्जुन का।

शनिवार, 9 फ़रवरी 2019

           मा शारदे
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मा शारदे,मा शारदे
हे मा शारदे।

भसियायल जा रहल छी
जिनगीक प्रवल धार मे
खेबब कोना कऽ नैया
भऽ बुद्धिहीन संसार मे
हमरो कने सम्हारि दे।
मा शारदे........
ई दुनियाक छै जे मेला
बड़ बड़ तकर झमेला
तनि ध्यान दे तू एम्हरो
मति मंद हम अकेला
तोँ आबि कऽ उबारि दे।
मा शारदे.........
भटकल फिरै छी सगरो
ने आस आब ककरो
सुनि ले नेहोरा हमर
नहि तऽ करबौ झगड़ो
एना नहि तोँ टारि दे।
मा शारदे.........
चंचल चपल बड़ मन रे
नहि विद्या सँ बढ़ि धन रे
कओन जतन से पायब
लागत कोना लगन रे
लऽ कऽ शरण तोँ तारि दे।
मा शारदे.........

गुरुवार, 31 जनवरी 2019

ये दुनिया है
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ये दुनिया है,यहाँ बाबू
हर चीज की अपनी कीमत है।
जितना चाहे लेना चाहो
ग़र मूल्य चुकाने की हिम्मत है।।
अगर पाने की कुछ है तमन्ना
कुछ खोने को रहना तैयार।
बड़ा सहज औ सरल गणित है
मुफ़्त नहीं है कुछ भी यार।।
दो ध्रुवीय है दुनिया अपनी
दो-दो के सब जोड़े हैं।
जोड़-घटाव गुण-भाग बरोबर
ना ज़्यादा ना थोड़े हैं।।
पाता प्रेम अस्तित्व,घृणा से
झूठ बिना ना सच की पहचान।
समझे कैसे क्या ईमान है
जो जग में ना हो बेईमान।।
अच्छे-भले बने फिरते हो
अरे बुरों को दो सम्मान ।
'भला'भले हैं उनके दम से
वर्ना उनकी क्या होगी शान!!
ये दुनिया है,यहाँ पर बाबू
ये मेले लगे रहेंगे।
गुण-दोष भुला कर जी लो
कल हम तुम कहाँ रहेंगे।।

रविवार, 13 जनवरी 2019

पल पल जीते ले विश्वास

पल पल जीते ले विश्वास

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ऐसी क्या मजबूरी है
हमसे क्यों यह दूरी है/
कब तक'बंकू'रहे उदास
आजा 'बाबू' मेरे पास//
है हमारा क्या कसूर
फिर हमदोनों काहे दूर/
एक हमारी यहीं अपील
हमें तो रहना है हिलमिल//






मैं तो छोता-छा 'दुग्गा' हूँ
छबका प्याला 'छुग्गा' हूँ/
कल ना छकता अभी प्लयाछ
छमझो दिल है तेले पाछ//
बछ दिनन का फेला है
ख़ता ना तेला- मेला है/
है दादा-दादी को विछवास
जीते पल-पल लेकल आछ//
आएँगे हीं अच्छे दिन
दिवछ बिताते हैं गिन गिन/
आएँगे जल्दी तेले पाछ
मत हो भैया कभी उदाछ//