मंगलवार, 9 जुलाई 2019

सुख की बदली छाई

   सुख की बदली छाई
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प्यासी धरती की सुन पुकार
आसमान झुक आया,
दु:ख-द्रवित हो नयन-नीर से
मेघा को बरसाया।

बीत गए दिन दुख के
सुख की बदली छाई,
अंकवार ले वारि-धार को
रसवंती धरती मुसकाई।

पुलकित गात रोमांचित रोमावलि
द्रुम-दल झूम रहे हैं,
पवन झकोर घन-गर्जन घोर
तृषित धरा को चूम रहे हैं।

केश खुले ज्यों वेश खुले
लता-गुल्म लहराते हैं,
झिनझिन झिंगुर टर्रटर्र दादुर
मेघा-राग सुनाते हैं।

प्यास बुझी  उमड़ी नेहा
नदिया तट को तोड़ चली,
आकुल-व्याकुल उछल तड़पकर
मिलने सागर ओर चली।

मिटे ताप संताप सभी
इंद्रधनुष नभ छाया,
धरा-गगन के मधुर मिलन से
अग-जग सब हर्षाया।
    __अशोक झा'दुलार'


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