आस्था का महापर्व:छठ
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दानवीर की कर्म-भूमि का
दिनकर से अलग ही नाता है ।
अर्घ्य प्रथम अस्ताचलगामी को,
फिर गीत उदयाचल का गाता है।।
है कृतज्ञता का बोध कुछ गहरा,
हम भूल उसे ना पाते हैं ।
हित हमारे काम जो आएँ,
पूज उन्हें, सिर दे मूल्य चुकाते हैं।।
जग में जो भी शोषित-पीड़ित,
हैं अंध-अपाहिज अनपढ़ निर्बल।
छठ-व्रती हम संतति सूर्य के,
उनके हित संकल्पित खड़े अचल।।
आस्था का "छठ" महापर्व,
राह यही दिखलाता है ।
कारुण्य-प्रेम मानवता का,
सीख हमें सिखलाता है ।।
सौर-शक्ति की साधना औ संरक्षित हों जलाशय।
स्वच्छ पवित्र परिवेश का, है सुन्दर यह आशय।।
हों अहम् विसर्जित निर्मल-मन,
हों साधना-सीदित निरोगी तन।
छठ-व्रत का अद्भुत यहीं प्रसाद है।
उल्लसित जन-जीवन, मिटता प्रमाद है।।
----अशोक झा " दुलार "
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दानवीर की कर्म-भूमि का
दिनकर से अलग ही नाता है ।
अर्घ्य प्रथम अस्ताचलगामी को,
फिर गीत उदयाचल का गाता है।।
है कृतज्ञता का बोध कुछ गहरा,
हम भूल उसे ना पाते हैं ।
हित हमारे काम जो आएँ,
पूज उन्हें, सिर दे मूल्य चुकाते हैं।।
जग में जो भी शोषित-पीड़ित,
हैं अंध-अपाहिज अनपढ़ निर्बल।
छठ-व्रती हम संतति सूर्य के,
उनके हित संकल्पित खड़े अचल।।
आस्था का "छठ" महापर्व,
राह यही दिखलाता है ।
कारुण्य-प्रेम मानवता का,
सीख हमें सिखलाता है ।।
सौर-शक्ति की साधना औ संरक्षित हों जलाशय।
स्वच्छ पवित्र परिवेश का, है सुन्दर यह आशय।।
हों अहम् विसर्जित निर्मल-मन,
हों साधना-सीदित निरोगी तन।
छठ-व्रत का अद्भुत यहीं प्रसाद है।
उल्लसित जन-जीवन, मिटता प्रमाद है।।
----अशोक झा " दुलार "