मुड़कर भी न देखा
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उसने मुड़कर भी न देखा,
और चला गया।
खड़ा देखता रह गया मैं,
जैसे छला गया।
बोला नहीं शब्द मगर अपनी,
फितरत जतला गया।
रिश्ते रहे मतलब भर शायद,
चुपचाप बतला गया।
उसने मुड़कर भी न देखा,
और चला गया।।
ये बेरुखी ये बेगानापन अरे,
अंदर दहला गया।
टकटकी लगाए रहा देखता,
आँसुओं नहला गया।
बातें याद आई उस दौड़ की,
जो हमें बहला गया।
उसने मुड़कर भी न देखा,
और चला गया।।
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उसने मुड़कर भी न देखा,
और चला गया।
खड़ा देखता रह गया मैं,
जैसे छला गया।
बोला नहीं शब्द मगर अपनी,
फितरत जतला गया।
रिश्ते रहे मतलब भर शायद,
चुपचाप बतला गया।
उसने मुड़कर भी न देखा,
और चला गया।।
ये बेरुखी ये बेगानापन अरे,
अंदर दहला गया।
टकटकी लगाए रहा देखता,
आँसुओं नहला गया।
बातें याद आई उस दौड़ की,
जो हमें बहला गया।
उसने मुड़कर भी न देखा,
और चला गया।।
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