इन परिंदों की तरह
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इन परिंदों की तरह अगर
अपना भी होता आकाश।
खींच लकीरें सीमाओं की
आपस में ना लड़ते काश।
उन्मुक्त उड़ान ग़र भर पाते
कैद न होते निज कारावास।
चाह जहाँ बस राह उधर ही
हो सारे जहाँ अपना आवास।
न सीमाओं के आर-पार तब
यूँ गिरते रहते जब-तब लाश।
फिर क्यूँ होते ख़ून के प्यासे
मानवता का ना होता ह्रास।
मन हो मुक्त हर कुंठा से
और प्राण न पाए त्रास।
इन परिंदों की तरह सदा
आकुल उड़ान की हो प्यास।
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