गुरुवार, 28 फ़रवरी 2019





इन परिंदों की तरह
*************
इन परिंदों की तरह अगर
अपना भी होता आकाश।
खींच लकीरें सीमाओं की
आपस में ना लड़ते काश।

उन्मुक्त उड़ान ग़र भर पाते
कैद न होते निज कारावास।
चाह जहाँ बस राह उधर ही
हो सारे जहाँ अपना आवास।

न सीमाओं के आर-पार तब
यूँ गिरते रहते जब-तब  लाश।
फिर क्यूँ होते  ख़ून के प्यासे
मानवता का ना होता ह्रास।

मन हो मुक्त हर कुंठा से
और प्राण न पाए त्रास।
इन परिंदों की तरह सदा
आकुल उड़ान की हो प्यास।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें