रविवार, 14 अप्रैल 2019

शाम की उदासी
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शाम की फैली उदासी में
होता है हर शय  उदास ।
बिछड़ने का सूरज से शायद
मन में कहीं छाती एहसास।

परत पर परत स्याह-सी
उतर उतर आती है रात।
पीकर उजाले को बेरहम
पालता भरम कि दिया मात।

अँधेरगर्दी मगर चलती कहाँ
नित नव सूरज लाता प्रभात।
मानता हूँ अहमियत तेरी भी
क़ीमत उजाले की तुझी से स्यात।
       __अशोक झा 'दुलार'

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