आँखें न पढ़ सके तुम
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बुद्धि गढ़ता शब्द है जो
मन ही में उपजे भाव से।
मस्तिष्क करता कारीगरी
मन-मिजाज स्वभाव से।
हैं शब्द सीमाबद्ध होते
हर भाव वहन न कर पाते।
शब्दातीत आँखों की भाषा
अव्यक्त व्यक्त भी कर जाते।
पर हाय! मेरे शब्दों पै अटके
मेरी आँखें न पढ़ सके तुम।
भावनाओं के उमड़ते ज्वार पै
नाव दिल की ना चढ़ सके तुम।
__अशोक झा'दुलार'
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बुद्धि गढ़ता शब्द है जो
मन ही में उपजे भाव से।
मस्तिष्क करता कारीगरी
मन-मिजाज स्वभाव से।
हैं शब्द सीमाबद्ध होते
हर भाव वहन न कर पाते।
शब्दातीत आँखों की भाषा
अव्यक्त व्यक्त भी कर जाते।
पर हाय! मेरे शब्दों पै अटके
मेरी आँखें न पढ़ सके तुम।
भावनाओं के उमड़ते ज्वार पै
नाव दिल की ना चढ़ सके तुम।
__अशोक झा'दुलार'
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