मंगलवार, 5 नवंबर 2019

गुस्सा कहीं का उतारा कहीं
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लटकाए मुँह घर हैं लौटे मियाँ
गुस्सा कहीं का उतारा कहीं।

इम्तिहान सब्र का इतना न लो
झूठे वायदे अब और गवारा नहीं।

खुद की अदालत कठघरे हो खड़े
जिरह खुद से किया करारा कभी!

गड़े मुर्दे उखाड़ते क्यूँ बार बार
हाँडी काठ की चढ़ती दुबारा नहीं।

ज़हर फिज़ा में ये कैसी घुली है
घुटता है दम क्या तुम्हारा नहीं!

अब भी तो संभलो अरे नादानों
कहर कुदरत दिखाता नज़ारा नहीं?

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