शुक्रवार, 3 जनवरी 2020

जाड़ कतेक पड़ै छै यौ
*****************
बंकू बाबू डुग्गू बाबू
औ जाड़ कतेक पड़ै छै यौ।
सुटकल दुबकल रहियौ घर धरि
बड़ शीतलहरि लहरै छै यौ।
स्वेटर पहिरू टोपी पहिरू
से एहि सँ जाड़ टरै छै यौ।
धोन्हीं चादरि सुरुज नुकेला
उफ़!पछबा हाड़ गड़ै छै यौ।
हाँ,हाँ,टोपी नहि ने फेकू
एना मे कान ठरै छै यौ।
खोंता धेने चुनमुनियाँ सब
नहि बकरी घास चरै छै यौ।
कुकुर बिलैया कूँ कूँ म्याऊँ
कंबल सीरक हेरै छै यौ।
गामो घर मे बूढ़-पुरनियाँ
घूरे लग जाय अरै छै यौ।
जाड़क अमरित आगि कहाबय
दुखिया संताप हरै छै यौ।
जाड़ कसैया बड़ निर्दैया
ओ ककरो ने छोड़ै छै यौ।
ठहरू ठहरू थोड़हि दिन बस
जाड़ोक उमेर ढरै छै यौ।
नेना भुटका घर मे बैसल
ई कविता याद करै छै यौ।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें